हिमाचल प्रदेश में हुए दर्दनाक बस हादसे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यहां हादसे संयोग नहीं, बल्कि लापरवाह सिस्टम की पैदाइश हैं। जांच में यह साफ हो चुका है कि जिस बस की अधिकृत क्षमता महज़ 39 सीटों की थी, उसमें 66 यात्रियों को ठूंस दिया गया।
यानी 33 + 33 = 66, और यह अवैध खेल सरेआम चलता रहा, जबकि जिम्मेदार विभाग मूकदर्शक बने रहे।
यह हादसा किसी एक चालक की गलती बताकर टाला नहीं जा सकता। यह सीधे तौर पर आरटीओ सिरमौर और ट्रैफिक पुलिस सिरमौर की घोर लापरवाही, कर्तव्यहीनता और संदिग्ध चुप्पी की तस्वीर पेश करता है। सवाल यह नहीं कि बस ओवरलोड क्यों थी, सवाल यह है कि इतने लंबे समय तक यह गैरकानूनी धंधा आखिर किसकी छत्रछाया में फलता-फूलता रहा?
कड़वी सच्चाई यह है कि—
कानून किताबों तक सीमित होकर रह गया है,
सड़क पर नियम सिर्फ आम नागरिकों को डराने के लिए लागू होते हैं,
चेकिंग अभियान दिखावे की रस्म बन चुके हैं,
और जब तक सब “मैनेज” है, तब तक अधिकारी अपनी जेब भरते रहेंगे, चाहे बसों में इंसानों की जान ही क्यों न कुचली जाए।
हादसे के बाद जांच के आदेश, बयानबाज़ी और औपचारिक कार्रवाई अब जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसी लगती है। अगर समय रहते ईमानदारी से नियमों का पालन करवाया गया होता, तो शायद आज कई घरों में मातम न पसरा होता।
अब जनता के सवाल तीखे हैं—
क्या आरटीओ सिरमौर और ट्रैफिक पुलिस सिरमौर सिर्फ कागजी कार्रवाई करेंगे या फिर सच में जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही तय होगी?

या फिर हर बार की तरह यह मामला भी फाइलों में दबाकर, समय के हवाले कर दिया जाएगा?
यह हादसा एक कड़वी चेतावनी है—
अगर व्यवस्था की यह सड़ांध यूं ही चलती रही, तो सड़कें यूं ही लाशें निगलती रहेंगी और जिम्मेदार बेखौफ बने रहेंगे।


















































